उत्तर प्रदेश की अधिकतर नदियां अब नाला बन गई हैं। बाढ़-सुखाड़ ने इन्हें मार दिया है, शहरीकरण ने इनकी आस्था एवं पर्यावरण रक्षा वाला व्यवहार और संस्कार समाप्त कर दिया है, जमीन के बढ़ते दामों के कारण भूमाफिया नदी भूमि पर कब्जा कर रहे हैं, उद्योगों ने नदी जल को प्रदूषित कर दिया है, भूजल शोषण के कारण जल स्तर नीचे जा रहा है तथा अनियमित खनन से नदियों में कटाव तेज हो गया है। फलतः नदी का पर्यावरणीय एवं प्राकृतिक प्रवाह अब नष्ट हो गया है।

समुचित सरकारी नीति के अभाव में नदियों का मूल स्वरूप बिगड़ गया है और जनजीवन नरकीय बनाया है। सामुदायिक दायित्व एवं राजकीय नियमों का एहसास और आभास नहीं रहा है। इसलिए नदियां अतिक्रमण, प्रदूषण, शोषण और सांस्कृतिक हृस का शिकार बन गई हैं। हम अपनी जिम्मेदारी समझकर नदियों को पुनर्जीवित करने वाली नीति बना रहे हैं। यह उत्तर प्रदेश की नदी नीति का प्रस्तावित प्रारूप है। इस पर आप अपने विचार प्रस्तुत कर सकते हैं, जिनको उत्तर प्रदेश की नदी नीति में शामिल किया जाएगा।

नदी नीति का दृष्टिकोण :-

अंग्रेजों ने सवा सौ साल पहले बनारस जैसी हमारी सांस्कृतिक राजधानी में गंदे नालों को गंगा नदी में डालना आरम्भ किया था। अब हमने अपने देश की सभी नदियों को मैला करना शुरू कर दिया है। गंदे जल (विष) को नदी के पवित्र (अमृत) जल में मिला रहे हैं। गुलामी में हुई शुरूआत को हम सभी आज भी भोगने को अभिशप्त हैं।

भारत में प्राचीन काल में ही अमृत-विष को अलग करने हेतु कुंभ होते थे। आज तो कुंभ भी विष को ही अमृत में मिलाते हैं। अतः इसे अलग-अलग रखने वाली नीति बनाकर ही हम विवाद रोक सकते हैं। विवादों का समाधान कर सकते हैं। सबसे पहले गंदे नालों को नदियों से अलग रखें। इस गंदे जल को उपयुक्त जगह पर उपचार करके उसको खेती-बागवानी और उद्योगों में उपयोग करने वाले कानून बनाये जायें।

गंदे जल को धरती के अन्दर नहीं डाला जाये। जो गुण मिट्टी और जल में अलग है, उसे अलग-अलग ही रखना है। नदियों को नदी बनाकर रखने की यही विधि है। जो नदियां नाला बन गई हैं, उन्हें भी पुनः नदी बनाने का यही तरीका है। खर्च कम करने, बीमारी रोकने तथा नीर-नारी और नदी को सम्मान देने का भी यही रास्ता है।

आजादी के पहले से आज तक नदी विवाद नहीं सुलझे हैं। बढ़ते बाढ़-सुखाड़ ने इन विवादों को ओर ज्यादा बढ़ा दिया है। यही कारण है कि राज्यों और राष्ट्रों के बीच पानी लेकर युद्ध के खतरे मंडराने लगे हैं। इसलिए आज युद्ध से बचने हेतु हमें प्रकृति संरक्षण एवं नदियों को पुनर्जीवित करने वाली नीति की अत्यन्त आवश्यकता है।

नदी हमारी धरती की नाड़ी है। इनके साथ कहीं भी कुछ भी बुरा काम होता है, तो इसका असर पूरी भूसांस्कृतिकता व प्रकृति को बिगाड़ता है। आज नदियों पर अतिक्रमण से बाढ़ और सुखाड़ बढ़ा है। प्रदूषण से बीमारी आई है। भूजल शोषण से पेयजल का संकट खड़ा हो गया है।

नदी पर अतिक्रमण, प्रदूषण और शोषण रोकने वाली नीति बननी है। किसी भी शहर-गांव में अब नदी मूल स्वरूप में नहीं बची है। कहीं का भी गंदा और दूषित जल नदी को नाले में बदल देता है। नदी की भूमि में बनने वाले मकान, होटल, रिसोर्ट तथा सीमेंट-कंकरीट से निर्मित नालियां, नालों एवं नदी किनारों का बदलना भी नदियों को नाला ही बना रहा है।

इससे नदी की आजादी नष्ट हुई है। नदियों के किनारे बसे शहरों की गंदगी से नदियों का मूल व पवित्र स्वरूप नष्ट हुआ है।

नदियों की संस्कृति और सभ्यता वाला देश अब प्रदूषित नालों की सभ्यता वाला बनता जा रहा है। हम दुनियां की सबसे वैभवशाली संस्कृति वाले माने जाते हैं। पर अब गंगा-जमुनी संस्कृति वाले सभ्य समाज को आधुनिक शैतानी सभ्यता ने नरकीय बना दिया है। हम इसे दुनियां की सबसे बुरी दुर्घटना मानते हैं।

मां कहलाने वाली हमारी नदी अब मैला ढोने वाली मालगाड़ी बन गई है। नदी का मैला जल, बीमारियों का वाहक भी बन रहा है। कारखाने व होटल, कानून को ताक पर रखकर गंदा, जहरीला जल धरती माता के पेट में बोर करके डाल रहे हैं। इस कारण हमारा चिकित्सा खर्च बहुत ही बढ़ गया है। धरती की गर्मी बढ़ गई है। मौसम का मिजाज बिगड़ गया है।

जलवायु परिवर्तन ने हमारी खेती बिगाडी है, फसलों का उत्पादन कम किया है। नीर-नारी और नदी का सम्मान नष्ट हो गया है। यह परिदृश्य हमारे लिए भयानक भविष्य की तरफ इशारा करता है, यह अनर्थकारी परिदृश्य आज की नई सभ्यता में जन्मा है।

भारतीय संस्कृति तो नदियों को पोषणकारी मां मानकर व्यवहार करती थी। आज की शोषणकारी सभ्यता ने नदियों को उत्पादन बढ़ाने वाले उद्योगों के लिए मालगाड़ी मान लिया है। यही जल और नदियों को बाजार बनाने की साजिश दिखती है। इसे रोकना इक्कसवीं सदी के दूसरे दशक का सबसे जरूरी और पहला काम हमने माना है। इसीलिए आगे नदी नीति लिखी है।

नदी नीति :-

नदी परिभाषा :- हिम, भूजल स्रोत एवं वर्षा के जल को उदगम से संगम तक स्वयं प्रवाहित रखती हुई जो अविरलता-निर्मलता और स्वतंत्रता में बहती है और सदियों से सूरज, वायु और धरती से आजादी से स्पर्श करती हुई जीव-सृष्टि से परस्पर पूरक और पोषक नाता जोड़कर जो प्रवाहित है वह नदी है।

लक्ष्य :- भारत की नदियों का चरित्र बिगड़ गया है, उसे अपने मूल स्वरूप में लाकर नदी को अपनी परिभाषा के अनुरूप बनाना।

उद्देश्य :- 1. नदियां राज, समाज और सृष्टि की साझी हैं। साझे हित में समाजोपयोगी इनकी सुरक्षा, संरक्षा, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक आस्था की योजना बनाने वाली मार्गदर्शिका ही इस नदी नीति निर्माण का उद्देश्य है।

राज को नदियों के संरक्षण हेतु नीति व नियम बनाने का अधिकार है। लेकिन समाज का भी नदियों के प्रति दायित्व और अधिकार उतना ही है जितना राज का है। यह राज, समाज और संतों की साझी नदी है।

2. नदियों को जल बाजार’ से बचाने हेतु नदी को बड़े बांध, अतिक्रमण, शोषण और प्रदूषण मुक्त रखना आवश्यक है। ‘जल बाजार’ वाली ताकतें पहले हमारी नदियों को मैला करती हैं, और फिर मैला मुक्त बनाने के लिए पैसा लगाकर अतिक्रमण करती हैं। जल दूषित होने पर बोतल जल खरीदने हेतु मजबूर बनाती हैं। हमारा ही जल हमें बिक्री करके हमारे जल और धन की लूट करती है। जल, धन, स्वास्थ्य सबकी ही लूट रोकने हेतु नदी नीति बननी चाहिए।

3. नदी विवाद का नीति के बिना समाधान नहीं है। विवाद समाधान हेतु नदी नीति का निर्माण करना अत्यन्त आवश्यक है।

4. स्वार्थी शक्तियां नदी नीति के विरूद्ध तनकर खड़ी है। उन्हें हटाकर पर्यावरण रक्षा एवं आस्था को कायम रखना है, आर्थिकी, स्वास्थ्य, पर्यावरण रक्षण एवं भारतीय आस्था हेतु नदी नीति निर्माण अब अतिआवश्यक है। राज, समाज एवं संतों की अब पहली प्राथमिकता है नदी पुनर्जीवित करने वाली नदी नीति बनाना। नदियों, उपनदियों, प्राकृतिक नालों का प्रबंधन स्थानीय समुदायों, जिला पंचायतों के स्तर पर किया जा सकता है। लेकिन नदियां को पुनर्जीवित करने का काम प्राथमिक तौर पर करना चाहिए।

5. पृथ्वी की गर्मी व मौसम के मिजाज के साथ मिट्टी की नमी का नदी के जल प्रवाह से गहरा रिश्ता है। जब यह बिगड़ता है, तब जलवायु परिवर्तन का प्रभाव गहरा होता है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को सहने हेतु नदी नीति निर्माण अत्यन्त आवश्यक है।

‘‘विकास दर को (जी.डी.पी.) ऊंचा दिखाने के मोह में हम नदियों के प्रदूषण, शोषण और अतिक्रमण की कीमत को ‘‘जी.डी.पी.’’ में शामिल नहीं करते इसलिये अब ‘‘जी.डी.पी.’’ में नदियों को हुई हानि को ‘‘जी.डी.पी.’’ में सम्मिलित करना चाहिए।’’

नदियां गरीब, अमीर व सभी धर्मों के समाज की साझी संपदा, जीवन, जमीर सभी कुछ है। उसका जीवन हक ‘जल’ उसके जीवन हेतु उपयोगी बनाकर रखने हेतु भी नदी नीति अत्यन्त आवश्यक है।

नदी नीति के सिद्धान्त :-

1. नदियों की भूमि का सीमांकन 100 साला बाढ़ क्षेत्र के अनुसार गजटेड डिमार्केशन, नोटीफिकेशन किया जावें। नदी प्रवाह क्षेत्र, बाढ़ क्षेत्र का उपयोग नहीं बदला जायें। उदगम से लेकर समुद्र तक नदी संरक्षण क्षेत्र घोषित करें। सीमांकन के सीमा चिन्ह का पूरे समुदाय को पता हो।

2. नदियों में किसी भी आबादी एवं उद्योग का प्रदूषित जल नहीं डाले। रिवर-सीवर को अलग रखने वाला सिद्धान्त अपनाया जाये।

3. नदी जल दूषित करने वालों को जन (गांव-समुदाय) सूचना के आधार पर फौजदारी अपराध और अर्थदण्ड का प्रावधान किया जाये।

4. नदियों की अविरलता-निर्मलता बनाए रखने के बड़े सभी उपायों, बेसिन क्षेत्र के संरक्षण एवं नदी पुनर्जीवन को सुरक्षा प्रदान की जाये।

5. नदियों में ‘पर्यावरणीय प्रवाह’ सुनिश्चित हेतु राज्य स्तरीय कानून बनाया जाए।

भारत की नदी नीति :-

1. नदी पुनर्जीवन एवं नदी का प्राकृतिक प्रवाह (पर्यावरणीय प्रवाह)

नदी जल का उपयोग पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करके ही किसी दूसरे कार्यों में किया जायेगा। हमें विश्वास है, कि समाज की आवश्यकता को पूरा करने के रास्ते में यह सिद्धान्त आड़े नहीं आएगा।

नदी नीति की सर्वोच्च प्राथमिकता नदी की अविरलता-निर्मलता कायम रखना है।

1.1 नदी जल की उपयोगिता-प्राथमिकता :

नदी जीवित रखने हेतु नदी जल निम्नवत् उपयोग होने चाहिए -

पर्यावरणीय प्रवाह,

पेयजल,

जीविका उपयोगी कृषि के लिए,

मेला-उत्सव-कुंभ,

घरेलू उपयोग, ग्राम पंचायत, नगर पालिका,

सांस्कृतिक पर्यटन,

ऊर्जा, उद्योग।

1.2 पर्यावरणीय प्रवाह की प्राथमिकता में परिवर्तन नहीं किया जायेगा :

नदी जल व भूजल साझा सामाजिक संसाधन है। इसका नियोजन स्थानीय समुदाय के हाथ में कानून हो। सामुदायिक नदी प्रबंधन पहले था। अब भी पुनः वहीं तंत्र खड़ा किया जाये।

सभी कौटुबिंक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और अध्यात्मिक संस्थाओं के भीतर नदी संरक्षण, नदी पुनर्जीवन के मूल्यों को नागरिकों के जीवन में प्रस्थापित करने हेतु शासन की ओर से छात्रों और नागरिकों को नदी, उपनदी अथवा स्थानीय प्राकृतिक नालों पर हर हफ्ते ‘स्वैच्छिक श्रम’ सामाजिक जागरूकता अभियान के रूप में जोड़ना आवश्यक है।

नदी उत्सवों, कुंभ, साप्ताहिक, मासिक और वार्षिक मेलों को भी तपो की शुद्धता का संस्कार देने वाला अवसर बनाने की नदी संस्कृति पुनर्जीवित करने वाले प्रयास धर्म सत्ता एवं लोक सत्ता व राज्य सरकारों को करने चाहिए।

1.3 नदी जल पर्यावरणीय प्रवाह में वृद्धि :

1.3.1 नदी का संभावित एवं उपलब्ध जल संसाधन, स्थाई एवं अस्थाई जल स्रोत, सतही जल, भू-जल आदि की एक वृहद सूची तैयार की जाये। इन संसाधनों के मॉडल तैयार करने की क्षमता का विकास किया जाये।

1.3.2 जन सहभागिता से स्थानीय, सब-बेसिन, बेसिन तथा भूमिगत जलधर से संबंधित जल संसाधन एवं पर्यावरण विकास की योजनाएं बनाई जायें। भारत सरकार इस नीति द्वारा यह सुनिश्चित करायें कि भूसांस्कृतिक विविधता का सम्मान किया जायेगा।

1.3.3 प्रस्तावित नई परियोजनाओं का मूल्यांकन समाज पर उनका प्रभाव, मूल्यांकन उनकी पर्याप्तता, पर्यावरण, जल संसाधनों का संरक्षण और निरन्तर घटते भूजल के आधार पर प्राथमिकता दी जाये।

1.3.4 पुराने तालाब-बावड़ी-कुओं का जीर्णोदार करायें। इनके कब्जें हटवायें। इन्हें कारगर बनाकर रखें।

1.3.5 स्थानीय सतही जल के संग्रहण के समुचित उपाय प्राथमिकता पर किये जायेंगे।

1.3.6 पारम्परिक जल संग्रहण संरचनाओं का संरक्षण, नई स्थानीय सरंचनाएं एवं नई तकनीक वाली स्थानीय लघु जल संग्रहण संरचनाओं के निर्माण को प्रोत्साहित किया जाये। छत के वर्षा जल के संग्रहण, अन्य वर्षा जल का संग्रहण, अपशिष्ट जल का पुनः उपयोग एवं चक्रण (रिसाइकिल) को प्रबल रूप से प्रोत्साहित किया जाये।

1.3.7 खेती हेतु जल के दक्षतम उपयोग को दर्शायें एवं प्रोत्साहित किया जाये।

1.3.8 सभी बेसिन में उपचारित जल के पुनः उपयोग के तकनीकी एंव आर्थिक संभावनाओं का आंकलन किया जाये।

1.3.9 नदियों में गंदे नाले नहीं मिलायें। वर्षा जल व मल जल अलग-अलग रखा जाये। नदियों में पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित किया जाये। मल जल उपचार करके खेती-बागवानी में काम लिया जाये।

1.3.10 कृषि हेतु भू-जल शोषण का इस प्रकार प्रबंधन किया जाये कि वह औसत दीर्घकालीन पुनर्भरण से ज्यादा न हो। भू-जल पुनर्भरण क्षमता का भी मूल्याकंन किया जाये। जिसमें जल-संकट वाले एवं अत्याधिक जल दोहन वाले क्षेत्रों पर विशेष जोर दिया जाये।

1.3.11 लवणीय भू-जल को काम में लेने योग्य बनाने हेतु उपलब्ध तकनीकों की विभिन्न परिस्थितियों में लागत-प्रभावकारिता का आंकलन किया जाये। इन तकनीकों को प्रायोगिक परियोजनाओं की मद्द से क्षेत्रीय परिस्थितियों में जॉचने हेतु उन इलाकों में लागू किया जाये, जहां पीने के पानी की या तो कमी है या जहां कोई अन्य जल स्रोत उपलब्ध नहीं है।

भू-जल के बेहतर उपयोग हेतु फव्वारा एवं बूंद-बूंद सिंचाई तकनीकों को प्रोत्साहित एवं और अधिक सुसाध्य बनाया जाये।

भारत भर में जल के अनुशासित उपयोग के संस्कार-दस्तूर-कानून-कायदे थे। उनमें समानता मूलक संशोधन के बाद उनका सम्मान किया जाये। जल पर सामुदायिक हक कायम करने वाली भारत की राष्ट्रीय जल नीति बने।

1.4 परियोजनाओं की संरचना एवं क्रियान्वयन :-

1.4.1 आर्थिक, सामाजिक, पर्यावरण एवं वित्तीय आधारों पर नदी प्रवाह बढ़ाने की परियोजनाओं की प्राथमिकता निर्धारित की जाये।

1.4.2 यथा सम्भव परियोजना में सतही एवं भू-जल का एकीकृत उपयोग किया जाये।

1.4.3 जल क्षेत्र से संबंधित विभागों की तकनीकी सहायता से हितभागियों द्वारा भविष्य में जल मांग के मात्रात्मक अनुमान तैयार किए जाये।

1.4.4 आयोजना, निर्माण और परियोजना संचालन काल में जल परियोजनाओं के प्रभावों (सामाजिक एवं पर्यावरण पर प्रभावों सहित) का परियोजना से जुड़े प्राधिकारों द्वारा समीक्षा की जाये।

परियोजना की शुरूआत वृह्द जांच और विस्तृत परिकल्पना पर निर्भर करें, जिसमें सामाजिक एवं पर्यावरण संबंधी आयाम अहम होंगे। 

2.0 एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन
2.1 जल उपभोक्ताओं का संगठन एवं भागीदारी

2.1.1 एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन को पूरे राष्ट्र में सामुदायिक समग्र जल प्रबंधन में लागू किया जाये।

2.1.2 एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन के आधार पर पंचायती राज संस्थाओं द्वारा जल उपभोक्ता समूहों को जल विषयों में आवश्यक तकनीकी सहायता प्रदान की जाये।

2.1.3 बड़े एवं लघु जल उपयोगकर्ताओं (महिलाआें सहित) द्वारा इन जल उपभोक्ता संगठनों के सदस्यों का चयन लोकतांत्रिक तरीके से उचित प्रतिनिधित्व द्वारा किया जाये।

2.1.4 एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन को प्रभावित किये बगैर राज्य सरकार एवं जल उपभोक्ता संगठनों के बीच सामन्जस्य स्थापित करने हेतु सहयोग स्थापित किया जाये।

2.1.5 जल संरक्षण हेतु सम्पूर्ण सामुदायिक चेतना जगाने के लिए संगठनों को उत्तरदायित्व सौंपा जाये, और उनके माध्यम से अभियान चलाए जाये, जिसका प्रमुख लक्ष्य यह होगा कि भूजल का उपयोग वार्षिक पुर्नउपयोग सीमा के अन्दर होगा। 

2.1.6 अरवरी नदी जल संसद के अनुभवों के आधार पर अन्य नदी जल संसदो बेहतर जल उपयोग के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की जिम्मेदारी दी जायेगी। जल संसदो के निम्न दायित्व भी होंगे, परन्तु यह इन तक ही सीमित नहीं होंगे -

नदी जल विषयों पर सामुदायिक शिक्षा, कम जल में खेती करें, नदी जीवन कायम रखें तथा नदी का पर्यावरणीय प्रवाह कायम रखने के बाद ही आगे विचार किया जाये।

ज्यादा बेहतर एवं समान आधार पर जल वितरण

सामान्य जल संसाधन प्रबंधन

आधारभूत ढांचे का संचालन एवं रख-रखाव

जल उपभोग के पूर्ण शुल्क की वसूली के चरणबद्ध प्रयास

आंकडे संग्रहण में सहयोग

हाइड्रोलॉजिक आंकड़ों का उचित प्रयोग

जल गुणवत्ता एवं जनस्वास्थ्य की समुचित रक्षा

2.1.7 जल क्षेत्र के विभागों द्वारा जल संबंधित तकनीकी आंकड़े, निर्देशिका, सूचना आदि जल संसदों को प्रदान की जाये। कुशल डेटा वितरण, डेटा संग्रहण की निरन्तरता और आंकड़ों की गुणवत्ता पर नियंत्रण निरंतर रखा जाये। जल आंकड़े आसान और पारदर्शी समाजिक उपयोग के अनुकूल बने।

2.2 नदी जल संसद के लिए संसाधन

2.2.1 प्रभावी जल संरक्षण, जल संसाधन प्रबंधन, जल गुणवत्ता संरक्षण आदि के लिए नदी जल संसदों एवं प्रशिक्षण हेतु तकनीकी, लाजिस्टिक एवं सामग्री रूपी सहायता प्रदान की जायेगी।

2.2.2 जल परियोजनाओं के पुनर्वास एवं आधुनिकीकरण के कार्यों में उन परियोजनाआें को प्राथमिकता दी जायेगी, जहां किसान, नदी जल संसदों से जुड़ने की इच्छा रखते हों।

2.2.3 छोटे सामुदायिक स्तर पर नदी जल संसदों में जल संसाधनों के प्रबंधन, संचालन, रख-रखाव एवं जल संरचना की शुल्क वसूली हेतु चरणबद्ध कार्यक्रम को लागू किया जाये।

2.2.4 जल संरचनाओं के प्रबंधन एवं उत्तरदायित्व निभाने हेतु जल उपभोक्ता समूहों को दिशा-निर्देश एवं आवश्यक सहायता प्रदान की जाये। भूमिहीन भी जल मालिक है। यह विश्वास पैदा करने वाले सामुदायिक जल संसाधन समुदायों को मान्यता दी जाये।

2.3 सामुदायिक स्तर पर तकनीकी प्रोत्साहन एवं सहायता :

2.3.1 जल संसाधन आयोजना विभाग जल संबंधित जानकारियों के प्रमुख स्रोत के रूप में कार्य करे एवं जल संसदों को क्रियाशील बनाने में योगदान दें।

2.3.2 जन जागरूकता हेतु एक अभियान चलाया जाये, जिसमें समुदायों को उनके विधिक सामर्थ्य, अधिकार, उत्तरदायित्वों एवं जल संसाधन प्रबंधन के सामान्य संसाधनों की जानकारी दी जाये।

2.3.3 सामुदायिक जल प्रबंधन के लिए बहु-विषयक तकनीकी सहायता को उच्च प्राथमिकता दी जाये। इसके साथ आवश्यक योजना जैसे जल संसाधन मॉडलिंग एवं नदी बेसिन/सब-बेसिन/जलघर प्रबंधन की निर्देशिका उपलब्ध करवाई जाये।

सिंचाई जल

3.1 सिंचाई पद्धति

3.1.1 सतही जलापूर्ति का प्रथम उद्देश्य उपलब्ध जल से ज्यादा से ज्यादा जमीन की सिंचाई करना होगा, भू-जल स्तर को दीर्घ कालीन नुकसान पहुंचाए बिना, भू-जल से सिंचाई के लिए मूल उद्देश्य उपलब्ध जल से ज्यादा से ज्यादा क्षेत्र की सिंचाई, करना होगा। वर्तमान में भूजल शोषण को व्यैक्तिक अधिकार समझे जाने वाले अनियंत्रित तरीके को हतोत्साहित किया जाये। इसके स्थान पर भूजल सामुदायिक दायित्व से दीर्घकालीन सामूहिक जल संसाधन बनाये रखा जायेगा। जिससे की भूमिगत जलघर अधिक समय तक सामुदायिक संसाधन बने रहें।

3.1.2 न्यायसंगत और प्रभावी सिंचाई व्यवस्था को निम्न की मदद से लागू किया जाये।

जैविक खेती, सजीव खेती, (नेचुरल फार्मिंग) को विशेष प्रोत्साहन दिया जाये।

एस.आर.आई., एस.सी.आई. जैसी तकनीकों को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाये।

फसल चयन स्थानीय जल स्थिति को ध्यान में रखकर सामुदायिक प्रक्रिया से किया जाये।

जमीन में कार्बन की मात्रा बढ़ाने के उपायों का प्रोत्साहन दिया जाये।

सिंचाई व्यवस्था में जल का न्यायसंगत एवं सामाजिक न्याय के आधार पर बंटवारा किया जाये।

नहर के शीर्ष एवं अंतिम छोर तक के बड़े और छोटे खेतों में जल उपलब्धता में विसंगतियों को बेहतर जल वितरण तंत्र की मदद से कम किया जाये।

समय आधारित सिंचाई जल वितरण व्यवस्था के स्थान पर आयतनमितीय आधार पर चरणबद्ध तरीके से वितरण व्यवस्था लागू की जाये।

किसानों को जल के वैज्ञानिक प्रबंधन हेतु शिक्षित किया जाये एवं प्रशिक्षण दिया जाये। आधुनिक सिंचाई पद्धतियों के प्रयोग हेतु उन्हें प्रोत्साहित किया जाये।

जल संसाधन आधारभूत ढांचा

4.1 आंकड़ों का संकलन एवं प्रसार

4.1.1 जल विज्ञानी उपकरण एवं आंकड़ा संकलन की विश्वसनीयता, पर्यवेक्षक संसाधन (जैसे भुगतान, ट्रेनिंग एवं गतिशीलता आदि), उपयोगिता एवं रख-रखाव, आंकड़े संग्रहण की निरन्तरता, अभिलेखों का रख-रखाव एवं अन्य संबंधित तथ्यों के आधार पर राज्य में जल सर्वेक्षण संबंधित माध्यम एवं आंकडों के संग्रहण की समीक्षा की जायेगी। इस समीक्षा के आधार पर जरूरी उन्नयन या बदलावों के लिए सुझाव तैयार किये जायें।

4.1.2 भू-जल की स्थिति के अध्ययन हेतु बोरहोल्स एवं भूजल स्तर मापक यंत्रों की समीक्षा कर आवश्यकतानुसार सुधार किया जाये। मॉनीटरिंग की समीक्षा की जाये, जिससे अध्ययन बोरहोल्स के तंत्र एवं नक्शों में सुधार होगा।

4.1.3 जल मौसम विज्ञानी और सतही एवं भूजल संबंधित आंकड़ों को यथाशीघ्र जल उपभोक्ता समूहों तथा जिला एवं ब्लाक स्तर के मध्यवर्ती स्तरों तक पहुंचाने हेतु एक आधार संहिता का विकास किया जाये।

4.2 सूचना प्रबंधन तंत्र

4.2.1 एक अन्तर विभागीय सूचना प्रबंधन तंत्र का विकास किया जाये। जल संबंधित सूचनाओं को जल उपभोक्ताओं की जरूरत के अनुसार संकलन, परिष्कृत एवं उपलब्ध कराने का कार्य किया जाये।

4.2.2 इस उपयोग सुलभ और सुरक्षित सूचना प्रबंधन तंत्र को राज्य जल संसाधन योजना विभाग में स्थापित किया जाये। राज्य जल संसाधन योजना विभाग डेटा की जांच एवं ऐन्ट्री, संकलन, बैकअप, डेटाबेस संचालन में पारदर्शिता एवं जरूरत पड़ने पर तुरन्त उपलब्ध कराये।

4.2.3 इस डेटाबेस में हाइड्रो-माटीरियोलोजिक, जल विज्ञान, भूजल गुणवत्ता आदि से संबंधित सूचनाओं के अतिरिक्त जल संसाधन से संबंधित जल उपभोक्ता समूहों, जनसंख्या एवं सामाजिक आंकड़ों के अभिलेख भी शामिल किए जाये।

4.2.4 आंकड़ों के संकलन की निरंतरता सुनिश्चित की जायेगी और सभी पुराने अभिलेख डेटाबेस में शामिल किए जायेंगे।

4.2.5 भूजल, बाढ क्षेत्र, पर्यावरण जोन आदि के मानत्रित तैयार किय जायेंगे।

4.2.6 आमजन को सुलभ एक संदर्भ जल पुस्तकालय बनाया जाये। जिसमें पूर्वकालिक एवं अब तक की सभी जल क्षेत्र से संबंधित महत्वपूर्ण रिपोर्ट एकत्रित होंगी। इन सभी स्रोतों की कम्प्यूटरीकृत सूची सार्वजनिक या निजी सुलभता के लिए तैयार की जाये।

4.2.7 पानी के वाष्पीकरण को मापने एवं जल संचयन संरचनाओं में इसे कम करने की संभावित पद्धतियों के लिए अनुसंधान किया जायेगा। यथासंभव इन पद्धतियों के मूल्याकंन अध्ययन किए जायें।

4.3 संरचनाओं की क्षमता एवं सुरक्षा

4.3.1 बांध सुरक्षा कमेटी को प्रभावी एवं उचित आकार का बनाया जाये। यह कमेटी निरीक्षण करके रिपोर्ट प्रस्तुत करें। कमेटी को निरीक्षण प्रतिवेदनों की अनुपालना एवं विनियम के अधिकार हों।

4.3.2 दैनिक आवक, उत्प्रवाह, वर्षा अभिलेख, संचयन स्तर एवं अन्य प्रचलनीय दस्तावेज सभी प्रमुख बांधों पर रखे जायें। वाष्पीकरण का भी सभी बडें बांधों पर प्रेक्षण किया जायें।

4.3.3 जो समुदाय प्रमुख बांधों के तलहटी में बसे हैं, उन्हें बाढ/बांध टूटने की चेतावनी एवं आपातकालीन निष्क्रमण तरीकों की जानकारी देना होगा। आपातकालीन बंदोबस्तों को जिला प्रशासन द्वारा उचित समय-बाध्यता एवं विभागों की प्रतिक्रिया के लिए दो वर्ष में एक बार जांचा परखा जायेगा। इन आपात स्थितियों के लिए सामाजिक तैयारी का भी आंकलन किया जाएगा और इनमें सुधार भी किया जायेगा।

4.4 जल निकास एवं लवण

4.4.1 शुरूआती लवणीय क्षेत्र एवं वर्तमान लवणीय क्षेत्रों, बहुत कम जल निकास क्षमता वाले क्षेत्रो के मानचित्र तैयार किए जाएगें। समुद्री जल को उपयोगी जल बनाने की सरल-सहज तकनीक खोजी जायें।

4.5 शहरी जल आपूर्ति एवं दूषित जल निकास

4.5.1 सभी शहरों क्षेत्रों के लिए मूलभूत जल एवं स्वच्छता सेवाओं की योजना बनाकर क्रियान्वित की जायेगी। प्रभावी जल दरें अपनाई जायेंगी जो कि संचालन एवं रख-रखाव की लागत को समाहित करेंगी। इससे जल उपयोग पर भी नियंत्रण किया जायेगा।

4.5.2 ऐसे कार्यक्रम शुरू किए जायेंगे जिनसे शहरी क्षेत्र में दूषित जल के निकास एवं प्रशोधन हेतु सीवरेज प्रशोधन संयंत्र एस.टी.पी. के निर्माण की आवश्यकता एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति जन-मानस में जागरूकता पैदा होवें। जल शोधन मापक अभी तक विदेशी बी.ओ.डी. और सी.ओ.डी. पर ही आधारित है। हमें जल शोधन के भारतीय मापक बनाने की पहल इस जल नीति द्वारा करानी होगी। भारतीय जलशोधन विधि अपनाने पर बल दिया जाये। जल शोधन में भारतीय ज्ञान तंत्र को उपयोग करने पर बल दिया जाये।

 जल संरक्षण

5.1 सामान्य जल संरक्षण

5.1.1 जल बचत तकनीकों के व्यावहारिक प्रयोग एवं जागरूकता को बढ़ाया जाये। जल उपभोग को और बेहतर बनाने के लिए मल्टी मीडिया से जागरूकता, स्कूली शिक्षा एवं तकनीकी सहायता द्वारा सभी वर्गों को एक निरंतर कार्यक्रम द्वारा प्रेरित किया जाये। जल संरक्षण के सामुदायिक विधि तरीके सिखाये जायें। परम्परागत जल प्रबंधन को बढ़ावा दें।

5.1.2 प्रत्येक प्रकार के अपशिष्ट प्राथमिक एवं द्वितीय प्रशोधित सीवेज जल, घरेलू उपयोग में लिया हुआ जल एवं पुनःचक्रित औद्योगिक जल आदि के उपयोग हेतु उचित प्रणाली का विकास किया जाये।

5.2 शहरी जल संरक्षण

5.2.1 जल रिसाव एवं जल वितरण में अनाधिकृत जल शोषण को रोकने के लिए एक आवर्ती प्रोग्राम हाथ में लिया जायेगा। जल वितरण से संबंधित सभी प्राधिकारों को बेहिसाब जल को 20 प्रतिशत से भी कम करना होगा। यह सुनिश्चित किया जाये, ताकि सभी जल मीटर सही कार्य कर रहे हैं।

5.2.2 जल हानि को रोकने हेतु कार्यक्रम चलाया जाये। जल संरक्षकों को सम्मान तथा जलशोषण करने वालो को दंड का प्रावधान होना चाहिए।

5.3 नगरपालिका एवं औद्योगिक जल संरक्षण

5.3.1 सीवेज निकास के पुनः उपयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा एवं उचित प्रशोधन के पश्चात इसे नगरपालिका उपयोगों जैसे औद्योगिक शीतल यंत्रों में, जंगलों, बागवानी, लाभदायक सतही उपयोग एवं भूजल पुनर्भरण हेतु उपयोग में लिया जायेगा। अधिक जल उपयोग करने वाले उद्योगों को जहां तक हो सके जल को पुनःचक्रित कर उपयोग में लाने हेतु बाध्य किया जायेगा।

5.3.2 खान विभाग प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करेगा कि जिस भूजल का खनन के दौरान दोहन किया गया है वह रसायनिक प्रदूषण को दूर करने के पश्चात किसी लाभदायक कार्य के लिए उपयोग किया जाए।

5.3.3 सभी बड़ें एवं छोटे उद्योगों के जल मापन हेतु एक आवर्ती कार्यक्रम शुरू किया जाएगा। सभी बड़े एवं लघु उद्यागों के औद्योगिक जल उपयोग का एक रजिस्टर भी तैयार किया जाएगा। इस जल अंकेक्षण में मात्रात्मक जल उपभोग, जल पुनःचक्रण एवं संरक्षण की क्षमता एवं संभावित प्रदूषण की मात्रा की जानकारी होगी।

5.4 ग्रामीण एवं कृषि जल संरक्षण

5.4.1 सिंचाई दक्षता में सुधार हेतु कार्यक्रम विकसित किया जाएगा एवं क्रियान्वित किया जाएगा।

5.4.2 सिंचाई में जल हानि को कम करने के लिए आवर्ती प्रोग्राम चलाया जायेगा।

5.4.3 खेतों को पानी से भर कर सिंचाई के विकल्प के स्थान पर दाब सिंचाई तंत्र जैसे बूंद-बूंद एवं फव्वारा सिंचाई को प्रोत्साहन दिया जायेगा।

5.4.4 सिंचाई पश्चात बचे जल के पुनः प्रयोग को बढ़ावा दिया जायेगा।

5.4.5 जलोत्थान द्वारा सिंचाई करने पर मीटर लगाना आवश्यक किया जायेगा।

5.4.6 जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन को हर एक बेसिन पर लागू किया जायेगा।

5.5 भू-जल

5.5.1 भूजल दोहन नियंत्रण हेतु उपाय किए जायें। नए कुओं/बोरहोल्स या पुराने कुओं/बोरहोल्स की गहराई बढ़ाने की इजाजत तभी दी जाये, जब की जल उपभोक्ता समूहों द्वारा भूजल प्रबंधन के दूरगामी एवं प्रभावी उपाय लागू किए गए हों।

5.5.2 सभी खुदाई यंत्रों को जल स्तर की दीर्घकालीन स्थिरता को देखते हुए ही लाइसेंस दिये जायें। सम्भव होंवे तो जल शोषण करने वाले यंत्रों पर रोक लगायें। जहां जल अधिक होवें वहां लाइसेंस देवें।

5.5.3 सभी खुदाई यंत्रों के माध्यम से भूजल से संबंधित तथ्य एकत्रित करके जल क्षेत्र आंकड़ा आधार में जोडे जायें। जल स्तर में कमी का भी विश्लेषण किया जाये एवं एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार की जाये। यह रिपोर्ट सभी को सहज उपलब्ध होवें ऐसी व्यवस्था बनायें।

5.5.4 चयनित क्षेत्रों में एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन को प्रोत्साहन द्वारा भूजल ह्यस, जल संरक्षण एवं जल को लम्बे समय के लिए टिकाऊ बनाने हेतु विषयों को प्राथमिकता दी जायें।

जल गुणवत्ता

6.1 जल गुणवत्ता एवं प्रदूषण

6.1.1 विभाग की विश्लेषण क्षमता, मॉनीटरिंग एवं जल मानकों के अनुरूप होने की समीक्षा की जायें। सामुदायिक मॉनीटरिंग हेतु समाज को तैयार करना। सामुदायिक मॉनीटरिंग को प्रोत्साहित किया जाये। समुदायों को जल मॉनीटरिंग व नदी मॉनीटरिंग करना सिखायें।

6.1.2 जिला स्तर पर जल की मूल गुणवत्ता, जन स्वास्थ्य सुविधाओं की समीक्षा की जाये। जिला स्तर पर एक आवर्ती प्रोग्राम विकसित किया जाये। जो जिला स्तर पर जल विश्लेषण की क्षमता में सुधार करें। सार्वजनिक एवं निजी भागीदारी से जल के नमूनों और विश्लेषण की प्रभावी लागत की समीक्षा की जाये। जल और मानव सेहत संबंध समझाया जाये।

6.1.3 जन स्वास्थ्य पर खतरों को देखते हुए प्राथमिकता पर बेहतर घरेलू जल गुणवत्ता हेतु चरणबद्ध कार्यक्रम चलाया जाये। जल-जन स्वास्थ्य सुधरे ऐसे सभी काम किये जाये।

6.1.4 स्थानीय पेयजल में फ्लोराइड अधिकता वाले क्षेत्रों की प्रगति समीक्षा की जाये और जरूरत पड़ने पर उपचारात्मक उपाय भी किए जायें। इस कार्य में समुदाय की समझ बढ़ायें। समुदाय की समझ का उपयोग किया जाये।

6.1.5 सभी प्रदूषण स्रोत बिन्दुओं की एक आवर्ती सूची बनाई जाये।

6.1.6 उद्योग निष्कासित जल को प्राकृतिक जल स्रोतों में छोडा ही नहीं जाए और न तो भूजल पुनर्भरण के उपयोग में ही लिया जाए। समस्त स्रावों का भारतीय मानकों के अनुसार उपचार किया जायें। उपचार के बाद खेती-बागवानी और उद्योगों में ही काम लेंवे। उद्योगों एवं नगरों का शोधित जल किसी कीमत पर भी प्राकृतिक जलस्रोतों नदी में नहीं मिलायें।

6.1.7 नए पुराने प्रदूषणकारी उद्योग एवं पुनर्स्थापित हो चुके उद्योगों को चिन्हित किया जाये। किसी भी गंदे एंव संक्रमित जल के भूजल या सतही नालियों में छोडने पर रोक रहेगी।

6.1.8 जल प्रदूषण फैलाने की आशंका वाले औद्योगिक ठोस पदार्थों का निपटारा विशेष सुविधाओं द्वारा एकीकृत अपशिष्ट प्रबंधन के आधार पर किया जायेगा। बहुत से प्रदूषित उद्योग ऐसा दूषित जल छोड़ते हैं। जिसका उपचार संभव नहीं है। ऐसे दूषित उद्योगों को सदैव हेतु बंद कर दिया जाये।

6.2 गंदा पानी

6.2.1 बिना प्रशोधित सीवेज के गंदे जल को प्राकृतिक जल स्रोतों में नहीं छोड़ा जायेगा और न ही भूजल पुनर्भरण के उपयोग में लिया जायेगा। वर्षा जल व गंदा जल अलग-अलग ही रखने की बाध्यता बनायें।

6.2.2 समस्त शहरी एवं उच्च प्राथमिकता वाले ग्रामीण ईलाकों में सीवेज प्रशोधन संयंत्र एस.टी.पी. के आकल्पन एवं निर्माण का एक प्रोग्राम लागू किया जाये। प्रशोधित निष्कासित जल के निपटारे में पूर्णकालिक स्वास्थ्य मानकों की पालना की जाये। अपशिष्ट जल का प्रशोधन लाभकारी पुनउर्पयोग आवश्यकता के अनुसार तय किया जाये।

पर्यावरण प्रबंधन

7.1.1 सीमांत एवं पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में मौसम की प्रवृत्तियों का दीर्घाकालीन प्रभावों का अध्ययन किया जाये। इस अध्ययन को एकीकृत जल प्रबंधन योजनाओं की प्लानिंग के लिए काम में लिया जाये।

7.1.2 बृहद एंव मध्यम जल संसाधन परियोजनाओं से पर्यावरण पर प्रभाव का स्वतंत्र अध्ययन किया जाये। उच्च प्राथमिकता अधिक अनुवांशिक विविधता वाले पर्यावरण तंत्रों की एक सूची तैयार करके उसमें मानव प्रभावों को आंका जाये।

7.1.3 झीलों एवं आर्द्र भूमि का संरक्षण किया जाये, जिससे पर्यावरण प्राकृतिक अनुवांशिक निरन्तरता को बनाए रखने का प्रयास किया जाये। नए आर्द्र भूमि के निर्माण पर विचार किया जाये।

7.1.4 बृहद एंव मध्यम जलाशय परियोजनाओं का अनुप्रवाह की ओर रहने वाले उपयोगकर्ताओं पर पड़ने वाले प्रभाव को योजना स्तर पर पहली प्राथमिकता दी जाये।

7.1.5 नदियों का पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित कराने हेतु भारत की सभी नदियों का पर्यावरणीय प्रवाह सिद्धांत बनाये जायें। इनकी पालना कराने वाली अच्छी व्यवस्था बने। नदियां नाले में नहीं बदलें। नदियां हमारी नदी ही बनी रहें। आज मानसिकता बदल रही है, आधुनिक विकसित समाज बाजार से पानी खरीदकर अपना जीवन चलाता है।

7.2 सूखा प्रबंधन

7.2.1 जल संसाधन प्रबंधन में सूखा प्रभावित क्षेत्रों की जल मांग को प्राथमिकता दी जायेगी। सामुदायिक एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन की मदद से सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सूखे के प्रति बहुआयामी तरीकों को प्रोत्साहित किया जाये।

7.2.2 नई जल संसाधन विकास योजनाओं के लिए संभाव्यता संबंधी अध्ययन किए जाये एवं सूखा प्रभावित क्षेत्रों को उच्च प्राथमिकता दी जाये।

7.2.3 वर्षा जल सहेजकर अनुशासित उपयोग करने से सूखा मुक्त होकर नदी पुनर्जीवित किया जाये। जैसे तरुण भारत संघ ने सूखा प्रभावित क्षेत्र में नदी पुनर्जीवित की है।

7.3 बाढ़ नियंत्रण एवं जल संग्रहण :

7.3.1 अधिक बहाव वाली नदियों पर क्रियाशील बाढ़ पूर्वानुमान तंत्र स्थापित किया जाये।

7.3.2 बाढ़ से खतरों के अनुमान हेतु संभावित बाढ प्रभावित क्षेत्रों को वर्गीकृत किया जायेगा। हर बाढ़ संभावित बेसिन/क्षेत्र के लिए आपातकालीन बाढ़ नियंत्रण एवं प्रबंधन योजना तैयार की जाये।

7.3.3 बाढ़ बचाव हेतु पहाड़ों में घने जंगल रूपी नैसर्गिक बंधों में पानी रोककर चलाना सिखायें। पानी को मैदान में इक्ट्ठा होने से पहले ही भूजल भंडारों तथा अधोभूजल भंडारों को भरने से बाढ़ कम होती है। जल का समान वितरण होता है। समान जल वितरण से बाढ़ नियंत्रित रहती है।

जल शुल्क

8.1.1 जल दरें इस प्रकार निर्धारित की जाये, जिससे जल की कमी का एहसास हो तथा उपभोक्ता को जल के उपयोग में सावधानी रखने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। जल शुल्क, पूर्ण संचालन खर्चो की वसूली आदि को ध्यान में रखकर ही निर्धारित किया जाये। इसके अनुरूप ही संचालन की दक्षता और रख-रखाव में क्षमता विकास किया जाये।

8.1.2 सभी गैर कृषि जल वितरण के लिए तीन या चार स्तरीय जल शुल्क होगा जिसमें सर्वाधिक जल प्रयोग के लिए सबसे ज्यादा शुल्क वसूला जाये। इस स्तरीय जल शुल्क को इस तरह निर्धारित किया जाये कि निम्न एवं अधिकतम जल दरों में परिमाण का भेद हो। जल शुल्क के पहले स्तर पर जल सस्ता होगा और सभी जल उपभोक्ताओं के लिए समान होगा।

8.1.3 औद्योगिक, व्यावसायिक एवं नगरपालिकाओं के जल उपयोग पर विभिन्न स्तरीय जल दरें लागू की जा सकती हैं। सभी मामलों में जल दर द्वारा अनावश्यक जल उपयोग को हतोत्साहित किया जाये।

8.1.4 वर्तमान अनुदानित कृषि जल और राज्य द्वारा अनुदानित सिंचाई के स्थान पर पूर्ण संचालन एवं रख-रखाव शुल्क वसूली और उपभोक्ताओं द्वारा नए आधारभूत ढांचा निर्माण में सहायता की ओर उत्तरोत्तर बदलाव होंवे।

8.1.5 जल प्रबंधन कार्य हेतु जल उपभोग मापन कार्यक्रम को सभी महत्वपूर्ण जल स्रोत अथवा जल स्वामित्व वाले उपभोक्ताओं पर लागू किया जाये।

विधिक आधार

9.1.1 जल क्षेत्र कानून की आलोचनात्मक समीक्षा की जाये। अप्रचलित कानूनों को हटाया जाये या अधिक एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन एवं प्रभावी सरकारी क्रियाओं के लिए जरूरी विधि के रूप में संशोधित किया जाये। एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन के उद्देश्यों की पूर्ति करने वाले एवं अधिकार, उत्तरदायित्व, शक्तियां, संसाधन एवं जल क्षेत्र के सभी हित भागियों के कार्य संचालन को दृढ़ता से लागू करने वाले विधान लाए जायें।

9.1.2 स्थानीय जल उपभोक्ताओं के अधिकार एवं उत्तरदायित्वों का कानून में निर्धारण किया जायेगा। जिससे वे अपने जल संसाधनों का खुद प्रबंधन कर सकें। इन विधायी प्रावधानों में किसानों, गरीबों एवं महिलाओं के जल उपभोक्ता समूहों में प्रतिनिधित्व एवं मुख्य भूमिका का विशेष ध्यान रखा जाएगा।

9.1.3 अति-शोधित एवं क्षीर्ण भूजल वाले क्षेत्रों में भूजल दोहन के नियंत्रण एवं प्रबंधन हेतु कानून पारित किए जायेंगे।

9.1.4 एक समय अवधि के बाद भी एवं इन उपायों के बावजूद भी अत्याधिक भूजल दोहना होता रहे तो ऐसी परिस्थिति में स्थानीय भूजल स्वामित्व को वापस लेकर विधान बनाए जायेंगे एवं भूजल दोहन दर को रोका जाएगा। भूजल उपयोग पर प्रतिबंध लगाने हेतु विधिक आज्ञा स्पष्ट हो एवं लागू की जायेगी।

9.1.5 जल क्षेत्र में विवादों को हल करने हेतु विधिक संरचना का विकास किया जायेगा। यह समुदाय के स्तर पर समाधानों से शुरू होगी एवं इसमें सरकार में उच्च स्तर पर अपील की जा सकेगी।

9.1.6 ऐसे विधान बनाए जायेंगे जिससे अधिक मात्रा में सीधे या स्थानीय भूजल उपभोग करने वालों को जल संरक्षण के क्षतिपूरक उपाय लागू करने के लिए बाध्य किया जा सके। जल संरक्षण के इन उपायों की व्यापक्ता पूरे जल उपयोग को ध्यान में रखकर बनाई जायेगी। जल संरक्षण में सहायक दिशा निर्देश तैयार किए जायेंगे। जल संरक्षण संबंधी मुख्य आवश्यकताओं की लगातार एवं अनुचित अनदेखी होने पर भूजल उपलब्धता को बंद करने के लिए कानूनी आधार बनाया जाएगा या फिर वितरित जल पर उच्च दरें लागू की जायेंगी।

9.1.7 मौजूदा नदी जल इकाइयों को अतिक्रमण एवं प्रदूषण से बचाने के लिए जल का कानूनी आधार बनाया जाएगा। बहुत अधिक प्रदूषण की दशा में स्थानीय जल उपभोक्ता समूहों को यह जिम्मेदारी दी जायेगी कि वे संबंधित विभाग से तकनीकी एंव अन्य सामग्री सहायता द्वारा प्रदूषण को खत्म करने की युक्ति करें।

9.1.8 सभी स्तरों पर मात्रात्मक जल संसाधन प्रबंधन को सुचारू करने के लिए जल उपभोक्ता समूह से लेकर जल संसाधन विभाग तक कुओं एवं बोरहोल्स की मीटरिंग, कूपों, जल-टैंकरों द्वारा वितरण, सिंचाई जल का वितरण एवं प्रमुख खंडों में नदी बहाव के जल मापन अथवा मीटरिंग के लिए एक आवर्ती कार्यक्रम शुरू करें। इसके लिए विधिसम्मत आदेश पत्र तैयार किया जाये, जो कि सम्पूर्ण जल का मापन सुनिश्चित करें।

9.1.9 भूजल और जमीन का मालिकाना हक अलग-अलग किये जायें। जमीन का मालिक भूजल का मालिक नहीं हो सकता। जल पर सबको जीने हेतु समान हक दिया जाये।

विधिक कार्य 

9.2.1 इस नदी नीति के प्रकाश में नदियों में पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करने वाला कानून बने। इस कानून में सबको नदी और मानव को समान रूप से नदी जल हक प्रदान कराने वाली व्यवस्था की जाये।

9.2.2 नदी-नालों को अलग-अलग करने वाली कानूनी व्यवस्था होवे। प्रदूषण करने वालों के विरूद्ध कठिन सजा की व्यवस्था की जाये।

9.2.3 नदी संसद (नदी घाटी संगठन) निर्माण में पंचायत और नगर पालिकाओं में नदी सांसदों की स्वतंत्र चुनाव व्यवस्था की जाये। प्रत्येक पंचायत में दो तथा नगरपालिकाओं में 4 से 10 तक नदी संसद चुने जा सकते हैं। जो नदी संसद के ही सदस्य होंगे। यह व्यवस्था नदी से जुड़ी जनसंख्या तथा नदी भू-भाग को ध्यान में रखकर करनी होगी।

9.2.4 नदी अतिक्रमण रोकने हेतु नदी क्षेत्र संरक्षण प्राधिकरण निर्मित होवे जो नदी प्रवाह, बाढ़, उच्चबाढ़, क्षेत्रों का सीमांकन कराके अतिक्रमण हटवायें।

9.2.5 भूजल शोषण रोकने वाला कानून प्रत्येक राज्य में नदियों के सूखने को ध्यान में रखकर बनाये जाये। नदियों में प्रवाह बराबर रखने हेतु अधोभूजल और भूजल शोषण रोकने वाला अच्छा सख्त कानून बने।

9.2.6 भूजल पुनर्भरण, प्रदूषित जल का पुनर्चक्रण उद्योग-खेती उपयोग करने वाली कानूनी व्यवस्था बने। वर्षा जल, भूजल, ग्लेशियर-हिमजल नदी का पर्यावरणीय प्रवाह बनाकर नदी की अविरलता-निर्मलता कायम रखने वाला कानून बनना चाहिए।

9.2.7 नदी विवादों के समाधान करने वाली कानूनी व्यवस्था शीघ्र निर्मित हो।

क्षमता विकास

10.1.1 सामुदायिक, मध्यस्तर राज्य सरकार, भारत सरकार स्तर पर संस्थानिक क्षमता का विकास किया जाये। इस क्षमता विकास में सभी स्तरों पर पुनः दिशा-निर्देशन द्वारा राष्ट्र और राज्य आधारित प्रचलित अभियांत्रिकी जल संचालन प्रबंधन के स्थान पर पूर्ण सामुदायिक सहभागिता संबंधी दृष्टिकोण अपनाना होगा।

10.1.2 सामुदायिक क्षमता विकास में संरचनात्मक अधिकार एवं उत्तरदायित्वों आदि में जल उपभोक्ता समूहों एवं जल क्षेत्र के अन्य समुदाय आधारित हितभागियों का प्रशिक्षण शामिल होगा।

10.1.3 सरकारी शासन स्तर पर क्षमता विकास की दिशा होगी। (अ) अपने कौशल को और अधिक बढाना (ब) बेहतर तकनीकी सहायता (स) डाटा प्रोसेसिंग, बेसिन जल संसाधन प्रबंधन हेतु योजना पर अधिक बल (द) कार्य की स्वायत्ता (ए) प्रतिक्रियात्मक प्रशासन के स्थान पर अग्रसक्रिय हो प्रश्नात्मक परीक्षण एवं जल संसाधन समीक्षा का दृष्टिकोण विकसित करें।

10.1.4 योजना निर्माण एवं क्रियान्वयन करने वाली पारम्परिक भूमिका को छोड़ नदी जल उपभोक्ता समूहों एवं जल क्षेत्र के अन्य समुदाय आधारित उपभोक्ताओं को समय रहते दक्ष तकनीकी एवं भौतिक सहायता प्रदान करना प्रमुख कार्य होगा। सरकारी एजेन्सियों एवं जल उपभोक्ता समूहों के बीच विशेषकर तकनीकी सूचना के आदान-प्रदान हेतु बेहतर संचार के लिए प्रभावी साधन विकसित किए जायें।

10.1.5 कुछ सिद्धांत जैसे सामुदायिक जल प्रबंधन की जरूरत, नदी जल संरक्षण, जल प्रबंधन, अनुकूलतम जल उपभोग आदि को स्कूल एवं प्राथमिक स्तर के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाये।

10.1.6 नदी जल की कमी के बारे में जागरूकता के पश्चात सामुदायिक जल प्रबंधन की व्यावहारिकता, बेहतर जल उपभोग में दक्षता, बेहतर जल संरक्षण के उपाय, जल संबंधित जन स्वास्थ्य एवं बेहतर जल निकास स्वच्छता आदि में जन शिक्षा शुरू की जाये। समुदाय स्तर पर क्षमता विकास का केन्द्र जल संरक्षण प्रबंधन हेतु मानव संरचना की जरूरत एवं राजकीय उपक्रम से सूचना एवं संसाधन प्राप्त करने की स्थानीय स्तर पर क्षमता वृद्धि आदि प्रमुख होंगे।

10.1.7 राष्ट्र एवं राज्य सभी नदी और जल क्षेत्र की विधाओं में प्रशिक्षण को प्रोत्साहित एवं समर्थन देवें। जिसमें एकीकृत जल विकास, जल वितरण, सामाजिक ढांचा, जन स्वास्थ्य, रासायनिक एवं माइक्रोबायोलॉजिकल जल गुणवत्ता, पर्यावरण प्रबंधन, सूखा क्षेत्र एवं खारे जल से कृषि को बढ़ावा होता है।

10.1.8 उचित, पर्याप्त, उपयुक्त एवं सटीक और निरंतर मौसम नदी जल विज्ञानी भूजल, जल उपभोग एवं जल गुणवत्ता आंकड़ां संग्रहण की विभिन्न राजकीय विभागों की क्षमता की समीक्षा की जायेगी। पूर्व में एकत्रित आंकड़ों की सटीकता, पूणर्ता, विश्वसनीयता एवं व्यवस्थित एवं अव्यवस्थित गलतियों आदि के लिए जांच की जायेगी एवं जहां तक हो सकेगा इन कमियों को दूर करने एवं सीमित करने हेतु क्रमसंगत पद्धितयां लागू की जायें।

10.1.9 मानवीय एवं पंजीकृत आंकड़ां संकलन, भौगोलिक सूचना तंत्र डेटाबेस, वेबसाइट, भौगोलिक सूचना तंत्र उपयोजन, कम्प्यूटर मॉडलिंग (भूजल, सतही जल एवं बेसिन हाइड्रोलॉजी) भूजल पुनर्भरण, जल संसाधनों के आंकलन एवं परिवर्तन और बेहतर सिंचाई क्षमता प्राप्त करना आदि क्षेत्रों में तकनीकी क्षमता विकास किया जाये।

10.2 अनुसंधान

10.2.1 भारत के अति महत्वपूर्ण नदी संबंधित विषयों पर केन्द्रित जल संसाधन अनुसंधान को शैक्षणिक एवं अन्य सरकारी संस्थानों में प्रोत्साहित किया जाये, एवं इन दोनों इकाईयों में सहभागिता की भावना का विकास किया जाये। अनुसंधान में आंतरिक एवं बाह्य विशेषतः अन्तर्राज्जीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ संस्थानों से सहयोग की संभावनाओं की खोज की जाये।

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