"क्लीन काली, ग्रीन काली" की मुहिम का असर काली के उद्गम अंतवाडा गांव में साफ़ तौर पर दिखाई दे रहा है. काली के दर्शन के लिए लोगों की आवाजाही जारी है. प्रशासनिक अधिकारी, सरकारी अधिकारियों के साथ साथ आम लोगों की जिज्ञासा भी काली को देखने के लिए काफी अधिक है. इसी श्रृंखला में अब संतों का नाम भी जुड़ गया है.

मंगलवार को काली नदी के उद्धार के लिए किये जा रहे प्रयासों और नदी धारा को देखने के लिए नंगली तीर्थ हरिद्वार से महामंडलेश्वर स्वामी श्री शिव प्रेमानंद जी महाराज नदी उद्गम स्थल अंतवाड़ा गांव पहुंचे. उन्होंने नदी पुनर्जीवन के लिए किए जा रहे प्रयासों को सराहा तथा एक ऐतिहासिक व पुनीत कार्य का बीड़ा उठाने के लिए नीर फाउंडेशन, रमनकांत त्यागी और उपस्थित सभी जनों को धन्यवाद दिया. साथ ही उन्होंने कहा कि नंगली आश्रम भी इस पुनीत क्रम में पूर्ण सहयोग करेगा, ताकि काली फिर अविरल बनकर प्रवाहित हो सके.




इसके साथ ही उन्होंने किसानों और ग्रामीणों द्वारा किये जा रहे श्रमदान को भी काफी महत्त्वपूर्ण बताया और कहा कि काली नदी को पुनर्जीवन देने के लिए किये जा रहे प्रयास उल्लेखनीय हैं और इन सभी प्रयासों को निरंतर जारी रखना होगा. मौके पर उनके साथ रोहताश प्रधान, मस्तराम गुर्जर, बलराज महात्मा, कृष्ण नंगली, मुकेश कुमार सहित अन्य लोग भी मौजूद रहे.

हाल ही में गांव अंतवाडा में एक विवाह समारोह में आई बारात ने भी काली नदी पर पहुंचकर स्वत: निकली धारा के दर्शन किये और प्रयासों की सराहना की. आगामी शुक्रवार को शूटर दादियां यानि श्रीमती चंद्रो तोमर और श्रीमती प्रकाशो तोमर अंतवाडा पहुंचेगी, यहां वें लोगों को जागरूक करने का कार्य भी करेगी. साथ ही यहां हर दिन लोगों की आवाजाही जारी है. 



काली को संजीवनी मिलने के साथ साथ ही अंतवाडा गांव भी चर्चा में आ गया है, गांववालों का कहना है कि काली पुनर्जीवन मुहिम चलने से गांववासियों के मन में भी स्वच्छता आदि मुद्दों के प्रति जागरूकता बढ़ी है. कयास लगाये जाने लगे हैं कि नदी अभियान के सफलतापूर्वक चलने से इतिहास के पन्नों में काली और अंतवाडा का नाम लिया जायेगा.

अंतवाडा के वरिष्ठ ग्रामवासी बताते हैं कि यह नदी उनके गांव के समृद्ध इतिहास का हिस्सा है, उनका मानना है कि पहले यहां काली पूरे प्रवाह के साथ बहा करती थी, जिसे पार कर घास आदि काटने के लिए जाना पड़ता था. साथ ही नदी का पानी बेहद साफ़ था और अक्सर काली खांसी जैसे रोगों में इस पानी को अन्य औषधियों के साथ मिलाया जाता था. कुछ ग्रामवासियों का यह भी मानना है कि जिस पेड़ के नीचे से नदी की धारा निकलती थी, उसका प्रयोग आयुर्वेदिक दवाओं में बहुतायत होता था, पर अब ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिलता है. अब अंतवाडा में नदी अथाह प्रदूषण की मार झेल रही है और कुछ स्थानों पर तो नदी नाले के समान लगती है. वहीं इसके जल में आज इतना प्रदूषण घुल चुका है कि यह तटवर्ती इलाकों में घातक रोग पैदा कर रहा है.

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